राष्ट्रवाद, दलित आदिवासी अधिकार, सोनाखान का संघर्ष और प्रो.आरी सितास का वक्तव्य

By | April 11, 2016

आरी सितास ने छात्रों को दिये वक्तव्य में कहा कि सोने की खदानों को हडपने, अफ्रीकी मूल निवासियों को वंचित करने के लिए, अंग्रेजों नें कानून बनाये और शोषण किया।
यह वक्तव्य उन्होंने इसलिए दिया ताकि ये प्रमाणित किया जा सके कि, स्वंतत्रता के बाद भी आदिवासियों और दलितों को अपने आप को बचाने के लिये ऐसी ही लड़ाई आज भी लड़नी पड़ रही है।


इसके उदहारण के रूप में छत्तीसगढ़ के बालोदा बाजार जिले के सोनाखान में ब्रिटिश कम्पनी वेदांत को प्रस्तुत किया जा रहा है जिसे 608 हेक्टेयर के क्षेत्र में सोने के उत्खनन के अधिकार दिए गए हैं।

Reference: Indian Express, April 10, 2016: Forgotten in gold rush, Chhattisgarh villages face uncertain future
स्थानीय दलित आदिवासी मंच इसका विरोध कर रहा है। उनका कहना है कि ये खान उनके जंगल,हवा और पानी को नष्ट कर देगी। उनका जीवन समाप्त हो जाएगा।
उनका कहना है कि वे वीरनारायण सिंह के रास्ते पर चल कर इस उत्खनन को रोकेंगे। वीरनारायण ने अंग्रेजों को उत्खनन से रोकने के लिये सेना बना कर संघर्ष किया। दस दिसंबर 1857 में उन्हें रायपुर में ईस्टइण्डिया कंपनी ने फांसी दे दी थी।
यानि भारत के हर प्रकृतसंसाधनों का उपयोग दलित आदिवासी विरोधी है।अंग्रेजों की तर्ज पर है।और उपनिवेशवाद ही है।और समाज में असमानता के निराकरण की लंबी प्रक्रिया सफल नहीं हो पा रही है।और राष्ट्रवाद बेमानी है।