Author Archives: Shridev Sharma

धर्म एवं संविधान

हमारे राष्ट्र भारत ने राजा राम से लेकर वर्तमान संविधान तक की यात्रा तय करी। संस्कृत के आदि कवि वाल्मीकि ने रामायण की रचना करी । कवि का अर्थ संस्कृत में, कविता लिखने वाले तक सीमित नहीं है अपितु कवि तो क्रांतदर्शी है।  क्रांतदर्शी वो है जिसकी दृष्टि को समय अपनी सीमाओं मे न बाँध सके ।  जो भूत भविष्य वर्तमान को एक साथ अनुभव कर सके वही सच्चा कवि है।  उस कवि दृष्टि ने राम को जाना जो प्रजाओं के हितैषी हैं ।  जिनका वचन पक्का है।  जिनके जीवन का उद्देश्य प्रजाओं की भलाई के अलावा और कुछ नहीं है।

धर्म एवम् संविधान

ऐसा तभी सम्भव हुआ क्योंकि राम धर्मज्ञ थे ।  धर्म तो हमारी अपने अंदर की समझ है।  धर्म सतत अपने आत्मविकास का मार्ग है।  वह हमे दूसरे के साथ बाँटने की प्रवृत्ति देता है। सच्चाई का पाठ सिखाता है।  दूसरे को क्षमा करने की दृष्टि देता है। दूसरे को नुक़सान न पहुँचाने की  बुद्धि ही सच्ची अहिंसा है और इसे जीवन में उतारने की प्रेरणा और शिक्षा धर्म से ही प्राप्त होती है।  राम ऐसे ही सकल गुणों के सागर होने के कारण लोकप्रिय राज्य व्यवस्था के मूर्तिमान रूप बने ।

हमारी वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था भी, न्याय, स्वतंत्रता, समता, और बंधुत्व की स्थापना के लिये है। पर क्या ये क़ानून बनाने और लागू करने से हो सकेगा? ये तो तभी सम्भव होगा जब हर नागरिक इसे अपने जीवन मे आत्मसात करे और अपनी विवेक बुद्धि मे उतार ले । सद्गुणों को आत्मसात कर दैनन्दिन व्यवहार मे उतार लेने की व्यवस्था ही धर्म है। ये व्यवस्था जिस समाज मे शतप्रतिशत सफल हो जाये वहाँ ही रामराज्य  है।

ऊं

स्वभावतः हम सभी जन्म से ही एक पहचान प्राप्त कर लेते हैं। ये पहचान हमें मैं और मेरा इस तरह की अनेकों सीमाओं में बाँध देती है। इस सीमित स्व से अपने परम विस्तार को ज्ञात करानॆ वाली विद्या ही ब्रम्ह विद्या है। यह विद्या उपनिषद, गीता, ब्रम्हसूत्र इस प्रस्थान त्रयी में उपनिबद्ध है।
Om, Shridev Sharma, ऊं
ये ब्रम्ह विद्या आत्मा के उस यथार्थ, शाश्वत तथा नित्य स्वरूप का साक्षात्कार कराती है जो सर्वत्र विद्यमान है। ऐसा आत्मा कर्ममार्ग के लिये आवश्यक धर्मों से भिन्न तथा सदा निष्पाप है। यह दृष्टि तो लोक, वित्त, तथा पुत्र इन एषणाओं को छोड़ने से ही मिलती है। सामाजिक प्रतिष्ठा,तरह तरह के धन, तथा पुत्रों शिष्यों की प्राप्ति की कामना, स्व की सर्वत्र व्याप्त सत्ता का साक्षात्कार नहीं होने देती।
पर जब तक ये देहात्म बुद्धि नहीं छूटे तब तक शास्त्रोक्त नित्य नैमित्तिक कर्मों का अनुष्ठान करना, एषणाओं की सिद्धि हेतु देवताओं की उपासना करना। इस प्रकार अपने सारे जीवन का निर्वाह करना यही ईशावास्योपनिषद् का उपदेश है।
इसी प्रसंग में अविद्या और विद्या का विचार उपनिषद् ने किया। अविद्या वेदोक्त कर्मों काअनुष्ठान है। विद्या स्व में देवत्व प्राप्ति हेतु उपासना है। इन दोनों का साथ ही अनुष्ठान करना उचित है। अन्यथा कर्मपरक अविद्या अकेले अनुष्ठान करने से आत्मदर्शन से विपरीत अंधकार की ओर ले जाने वाली होगी। कर्म मार्ग का अनुष्ठान न कर यदि मात्र देवत्व जागृति के लिये विद्या रुपी उपासना ही करेगा तो लोक की व्यवस्था का उच्छेद और गहरे अँधेरे में ले जायेगा।
इस प्रकार विद्या और अविद्या के फल देवलोक एवं पितृलोक के देनेवाल होने से भिन्न हैं। पर यदि विद्या एवं अविद्या का अनुष्ठान यदि सम्मिलित रूप से किया जाय तो कर्म मृत्यु से पार कर देगा और विद्या देवत्व को जागृत कर अमृतत्त्व को प्राप्त करा देगी।
इस देवत्व को जागृत कराने वाली विद्या का स्वरूप दो प्रकार का है। एक असम्भूति अर्थात कारण ब्रम्ह की उपासना दूसरा सम्भूति अर्थात कार्य ब्रम्ह की उपासना। सभी कार्यों का संभवन(उत्पत्ति) स्थान कारण ब्रम्ह है। अकेले, असम्भूति जो सकल काम और कर्मों के बीज रूप में होने के कारण अव्यक्त और अदर्शनीय है, की उपासना से साक्षात्कार भी अंधकार रूप ही होगा। इसी प्रकार कार्यब्रम्ह की अकेले उपासना का फल भी अंधकार रूप ही है।
कार्य ब्रम्ह (संभूति) की उपासना अणिमादि ऐश्वर्यों को देगी वहीं कारण ब्रम्ह की उपासना प्रकृतिलय करा देगी। इस प्रकार दोनों का फल धैर्य पूर्वक अनुभव कर चुके लोगों से सुना गया है।
इस प्रकार, अनैश्वर्य, अधर्म, अवैराग्य की निवृत्ति हिरण्यगर्भ रूप कार्य ब्रम्ह की उपासना से होने के बाद अणिमादि ऐश्वर्यों को प्राप्त कर, पुनः कारण ब्रम्ह में अमृतरूप प्रकृति लय को एक साथ में उपासना करने से प्राप्त करता है।

क्या अम्बेडकर मनुवादी थे ?

इंडियन एक्सप्रेस में प्रो. शमसुल इस्लाम ने 23 अप्रैल को  एक ” नहीं है अम्बेडकर से प्रेम” इस शीर्षक से लेख निकाला। गुरू जी के हिंदु जनों के विराट पुरुषत्व की अवधारणा के आधार पर मनुस्मृति के संवैधानिक सिद्धांतों की अवहेलना संविधान सभा द्वारा किये जाने को याद दिलाया। साथ ही यह भी कह डाला कि ये तो दलितों को सवर्णों के सेवक बने रहने के मनु के सिद्धांत से गुरु जी की गहनता का परिचायक है।

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अब ऊपर लिखे बिंदुओं पर विचार करें तो यह किसी राजनीति शास्त्र के गहन अध्येता की बारीक समझ से निकला हुआ तो बिलकुल नहीं लगता।
अकादमिक दृष्टिकोण तो वह तब हो सकता है कि जब वो निष्पक्ष हो।निष्पक्षता से विचार करें तो संघ और संघ का सिद्धांत क्या है? संघ का एकमात्र सिद्धांत भारत माता की नैष्ठिक और स्वतः प्रेरित सेवा करना। जो इसे जीवन सिद्धांत अपनी स्वतः प्रेरणा से मान ले वह ही स्वयंसेवक है।

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तो इस दृष्टि से देखा जाय तो अम्बेडकर ने निस्संदेह रूप से भारत माता की सेवा करी। उन्होंने हिंदु समाज को दुर्बल करने वाले छुआछूत के बखेड़े को छोड़ने के लिये समझाया। छुआछूत का शिकार राजसत्ता से गिरे क्षत्रियों को बनाया गया ये तो उनका सिद्धांत था। तो इस दलन का शिकार बने दलित वास्तव में क्षत्रिय हैं ये सच जगजाहिर करने वालेअम्बेडकर मनुवादी मान लिये जाएँगे।
जो भी हो हिंदु हित चिंतक और भारत माता के सच्चे सपूत होने के नाते अम्बेडकर संघ के लिये सम्माननीय थे और रहेंगे। संघ तो छुआछूत जातपात गरीब अमीर शिक्षित अशिक्षित का भेद हिंदु मात्र के मन से से मिटाने की सच्ची व्यवस्था का नाम है। भेद भाव मिटाना,मन मिलाना,सब को सहेज के चलना,यही तो संघ व्यस्था का मूलमंत्र है।एक प्रचारक का जीवन इसी साधना में जाता है।
संघ समाज को विषमुक्त करने की संस्था है। इसी लिये भव्यता से खड़ी है और लोकमान्य है।

Guha, the RSS and Ambedkar

Ramchandra Guha has reminded the Sangh of past writings of Guruji Golvalkar. Guruji wrote that ‘Maharshi’ Nehru and ‘Rishi’ Ambedkar had dispensed with Sanatan Dharm while framing the Constitution. Therefore it is reflective of an inner conflict within the RSS.
Ramchandra Guha, RSS, Ambedkar, Shridev Sharma
The aforesaid comments by Guruji were made when the provisions of divorce were introduced. Sanatan Dharma believes in the unification of body and mind of a husband and wife. By the chanting of sacred vedas in the presence of the God of fire, and by appropriate rituals called cathurthi karm, the two are united such as never to separate. That was the fundamental  accomplishment of marriage according to Hindu faithfuls. Therefore they were opposed to the idea of divorce. Guruji was head of each family of swayamsevakas, a unifier, serving the cause of Hindu unity. He responded appropriately.

The Indian Express | April 21, 2016 8:11 am | by Ramachandra Guha 

http://indianexpress.com/article/opinion/columns/br-ambedkar-2762688/

Guruji called Nehru “Maharshi” and referred to Dr. Ambedkar as “Rishi”, reminding people about the Nehruvian determination to frame the 1935 Government of India Act as the Constitution of India. Nehru was a wholehearted supporter of the Raj style of governance of India. It may be recalled that it was Nehru who prevailed upon the Constituent Assembly to preserve most of the provisions of the said Act.
It was only Dr. Ambedkar who could prevail upon Nehru and could make some of revolutionary changes in the British framework of Government of India Act.  Therefore calling Nehru “Maharshi” is an apt expression for a person who appropriately created the Indian model of  Westminster-style democratic institutions.
Nehru could effectively hamper the Ambedakarite vision of introducing  ‘Dharma’ in the Constitution due to the clout he had from occupying  the Prime Minister’s office,  and could prevent Dr. Ambedkar from making a more liberal and  ‘Dharma’-centric  constitution. Therefore, Guruji, while reducing Ambedakar to a ‘Rishi’, a lessor sage, was making an apt observation on the reality of the prevailing situation.
In the current scenario, intellectuals are behaving suspiciously. They want to ignite caste wars in the entire nation. They want to carve out India further into smaller nations. They are creating an intellectual environment to intensify debates on this secessionist agenda. They want to hurt the Indian economy and destroy the traditional business model of India. Indian business has helped nationalism and Dharma in every century. The so-called ‘progressive’ media enjoys throwing muck at the business class. They want to uproot  this class by igniting cast wars. Their agenda is to shake the tree till it gets uprooted.

The Indian Express | December 10, 2015 3:30pm | by Ramachandra Guha 

http://indianexpress.com/article/opinion/columns/bhagwats-ambedkar/

The borders of our nation are well protected by valorous and glorious soldiers. Business activity spread across every nook and corner helps the economy accelerate. The businessman contributes by paying taxes and he helps maintain the socio-religious stability of our country. Caste war can hurt him and wipe him out. We can already see the consequences of Gujarat and Haryana cast struggles.
Mr. Guha would know for sure that Guruji would have supported the present stand of the RSS. He would have circumambulate the country one more time to spread the message of nationalism and to make every household aware of this evil design. I think the Sangh is bound to do the same. It would tell each household of the looming danger,  and the need to stand up for the nation.
Many leftist in India trust in God, many are still influenced by thoughts of Sanatan Dharma. They know  that every Indian shares the swayamsevaks’ aspirations and notions of their divine Motherland. This is a great emotional issue. People who are adamant on hurting such emotions can hardly be wise. Do they want Hindus to meet the fate of the Syrians, and Iraqi Yazidis? They want Hindus to loose their nation, their Dharma, culture, dignity and means?
Against this backdrop one can really understand why Mr. Guha is so critical of the RSS and its unification efforts.
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गुहा, संघ और अम्बेडकर

रामचन्द्र गुहा जी ने गुरु जी गोलवलकर के लेख का स्मरण संघ को दिलाया है। गुरु जी ने कहा था कि महर्षि नेहरू और ऋषि अम्बेडकर ने संविधान के नाम पर सनातन धर्म को तिलांजलि दे डाली। ऐसे में आज अम्बेडकर को हिंदु सुधार और एकता का प्रतीक बताना संघ के अन्तर्विभेद का द्योतक है।
Guha RSS & Ambedkar| Shridev Sharma | JNURow
 
गुहा जी परम विद्वान विचारक हैं। इस में कहाँ संदेह है कि सनातन धर्म में पति और पत्नी दो कहाँ रह जाते थे। सनातन धर्म में भगवान वेद अपने मन्त्रों से अग्नि की साक्षी में दोनों को कभी अलग न हों इस तरह एक कर देते थे। दोनों का शरीर मन वचन एक हो जाय यह ही तो गृहस्थ धर्म की सिद्धि थी। तो ऐसे में तलाक उन दिनों कौन सोचता। गुरु जी तो हर स्वयंसेवक के परिवार के अभिभावक थे हिंदुओं को जोड़ने के काम में जुटे थे। उनका तलाक के प्रावधानों पर यह प्रक्रिया देना स्वाभाविक ही था।

The Indian Express | April 21, 2016 8:11 am | by Ramachandra Guha 

http://indianexpress.com/article/opinion/columns/br-ambedkar-2762688/

रही बात ऋषी महर्षी की तो 1935 के गोवरन्मेंट ऑफ इण्डिया एक्ट को संविधान बनाने की दृष्टि पंडित नेहरू की थी। संविधान सभा ने बहस तो बहुत करी पर संवैधानिक प्रावधानों के रूप में तो अंग्रेज के गोवरन्मेंट ऑफ़ इण्डिया एक्ट को ही स्थान दे दिया गया।नेहरू जी पुरी तरह उस व्यवस्था को बहाल रखने में लगे थे। उनकी आस्था मात्र उसी व्यस्था में थी।

ये तो बाबा साहब का माद्दा था कि वे कुछ क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाले प्रावधान नेहरू के विरोध करने पर भी संविधान सभा में पारित करवा सके।
तो नेहरू वो महर्षि बने जिन्हें वेस्टमिनिस्टर मॉडल का अक्षरशः अनुकरण करने वाली नई भारतीय संप्रभु सत्ता की राजविद्या का प्रथम साक्षात्कार मिला। प्रधानमंत्री होने के कारण अम्बेडकर को उन्होंने ऋषि ही रहने दिया यानि ज्यादा चलने न दी नहीं तो अम्बेडकर तो धर्मवादी व्यवस्था लाते। तो गुरु जी तो अक्षरशः ठीक थे।

आज अब जो बचा खुचा भारत रह गया है, उसमें बुद्धि जीवियों का आचरण अत्यंत संदेहास्पद है। वो भारत में जातियुद्ध कराने वाले विचार के भाषण करते हुए उच्चे उच्चे नारे लगा रहे हैं। वो भारत को खंड खंड करना चाहते हैं।वो ऐसा वातावरण तैयार कर रहे हैं कि लोग भारत में पैसा न ला सकें। भारतीय व्यापारी सदा से राष्ट्रवाद का पोषक रहा है। उस व्यापारी को कलुषित कर बदनाम करने में प्रगतिशील लेखकों को अपार आनंद मिलता रहा है। अब वो उसे जातियुद्ध में झोंक कर बर्बाद कर देना चाहते हैं। ताकि राष्ट्रवाद को झकझोर झकझोर कर हिला सकें।

The Indian Express | December 10, 2015 3:30pm | by Ramachandra Guha 

http://indianexpress.com/article/opinion/columns/bhagwats-ambedkar/

जहाँ राष्ट्र की सीमा का गौरवशाली प्रहरी वीर जवान है, वहीं समाज में व्यापारी हर नुक्कड़, गली मोहल्ले में बैठ कर अर्थव्यवस्था की गति के सारथी का काम करता है। टैक्स देता है, सामाजिक धार्मिक कार्यों में सहयोग करता है। उसे ध्वस्त करने का तरीका है जाति के आधार पर झगड़े कराना।
गुजरात हरियाणा के जाति आन्दोलनों को हम देख ही चुके हैं।
तो ऐसे में संघ अपने राष्ट्रधर्म का पालन कर रहा है। डॉ हेगडेवार ने संघ की स्थापना सनातन देशधर्म का पालन करने के लिए ही तो की थी। हर स्वयंसेवक भारतमाता का सच्चा वीरव्रती उपासक है।

गुहा महाशय को ये निस्संदेह मान लेना चाहिये कि यदि गुरु जी आज होते तो वो भी ये ही करते। साथ ही में पूरे देश की एक परिक्रमा कर घर घर में ये सन्देश दे देते। संघ भी यही करेगा सीधे सच्चे शब्दों में जनेयू के आचार्यों के उद्देश्य घर घर में बताएगा। भारत में भगवान वामपंथी भी मानते हैं, कई तो कट्टर सनातनधर्मी विचारों से भी यदाकदा प्रेरित हो उठते हैं। उन्हें अच्छे से ये पता है कि इस धरती को भगवान मानने वाले संघी ही नहीं सभी देश वासी हैं।ये भावना से जुड़ा मुद्दा है।

ये तो दुर्बुद्धि ही होंगे जो लोगों की भावना को आहत करने वाले भाषण छाती ठोक ठोक कर दे रहे हैं। वो भी देश तोड़ने का सन्देश देने के लिये ताकि इराक और सीरिया जैसी दुर्गति भारत और हिंदुओं की हो जाए। हिन्दू देश धर्म संस्कृति सम्मान और सम्पदा सब खो बैठें।

इस मुद्दे पर संघ को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश गुहा जी क्यों कर रहे हैं ये तो स्पष्ट हो ही गया है। 
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बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर की 125 वीं जयन्ती


बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर की 125 वीं जयन्ती आज है। एक परम्परागत समाज में व्याप्त वर्णव्यस्था में अपमान उन्हें विरासत में मिला था। परंतु उनकी प्रतिभा अध्ययनशीलता, समाजनिष्ठा, राष्ट्रभक्ति ने भारत के प्राचीन राष्ट्रवाद को, स्वाधीन सार्वभौम लोकतान्त्रिक कालानुसारि राज्यव्यवस्था के रूप मे पुनः प्रतिष्ठापित किया।

Ambedkar 125th Birth Anniversary

 

वे सदा धर्मनिष्ठ रहे। धर्म का उन्होंने गहन अध्ययन किया। ब्राम्हण और श्रमण विचारधारा के मूल सिद्धान्त उन्होंने हृदयंगम कर लिये थे। उनकी लेखनी ने धर्म और व्यवहार की सूक्ष्मता से परख की। उनका काल उनकी प्रतिभा से दिशा प्राप्त कर सका।
ये तय है कि भगवान् भारतवासियों के मध्य किसी न किसी दिव्य आत्मा को भेजते हैं , जो झकझोर कर भारतीय चेतना को जागृत रखती है। डा.अम्बेडकर का जन्म ऐसे ही काल में हुआ।

भारत महाभारत की सीमाओं को खो रहा था। ‘ईश्वरः सर्वभूतानाम् हृद्देशेर्जुन तिष्ठति’ का ये गीता का उदघोष जो हमें हर अस्तित्ववान् के ह्रदय में बैठे ईश्वर का स्मरण कराता था हम खो चुके थे। हमारी धर्मदृष्टि क्षीण हो चुकी थी। हम टुकड़े टुकड़े जी रहे थे। तब जिन महापुरुषों ने भारत को जगाया और और गौरवमय राष्ट्रचेतना के सनातन ध्वज को भारत माता के हाथ में पुनर्स्थापित किया, उसमें वो अग्रगण्य ही रहेंगे।

वे धार्मिक थे, जीवनभर राष्ट्रधर्म का निर्वाह किया। छुआछूत भारतमाता के ह्रदय को शोकाकुल करता है, ये उन्होंने हर हिन्दू को याद दिलाया।महापरिनिर्वाण से पूर्व बुद्ध के सनातन धर्म के संघ की चेतना की दीक्षा प्राप्त की।


ऐसे महापुरुष को उनके जीवन की सपाद शताब्दी पर शतशत नमन।

राष्ट्रवाद, दलित आदिवासी अधिकार, सोनाखान का संघर्ष और प्रो.आरी सितास का वक्तव्य

आरी सितास ने छात्रों को दिये वक्तव्य में कहा कि सोने की खदानों को हडपने, अफ्रीकी मूल निवासियों को वंचित करने के लिए, अंग्रेजों नें कानून बनाये और शोषण किया।
यह वक्तव्य उन्होंने इसलिए दिया ताकि ये प्रमाणित किया जा सके कि, स्वंतत्रता के बाद भी आदिवासियों और दलितों को अपने आप को बचाने के लिये ऐसी ही लड़ाई आज भी लड़नी पड़ रही है।


इसके उदहारण के रूप में छत्तीसगढ़ के बालोदा बाजार जिले के सोनाखान में ब्रिटिश कम्पनी वेदांत को प्रस्तुत किया जा रहा है जिसे 608 हेक्टेयर के क्षेत्र में सोने के उत्खनन के अधिकार दिए गए हैं।

Reference: Indian Express, April 10, 2016: Forgotten in gold rush, Chhattisgarh villages face uncertain future
स्थानीय दलित आदिवासी मंच इसका विरोध कर रहा है। उनका कहना है कि ये खान उनके जंगल,हवा और पानी को नष्ट कर देगी। उनका जीवन समाप्त हो जाएगा।
उनका कहना है कि वे वीरनारायण सिंह के रास्ते पर चल कर इस उत्खनन को रोकेंगे। वीरनारायण ने अंग्रेजों को उत्खनन से रोकने के लिये सेना बना कर संघर्ष किया। दस दिसंबर 1857 में उन्हें रायपुर में ईस्टइण्डिया कंपनी ने फांसी दे दी थी।
यानि भारत के हर प्रकृतसंसाधनों का उपयोग दलित आदिवासी विरोधी है।अंग्रेजों की तर्ज पर है।और उपनिवेशवाद ही है।और समाज में असमानता के निराकरण की लंबी प्रक्रिया सफल नहीं हो पा रही है।और राष्ट्रवाद बेमानी है।

अभिव्यक्ति के अधिकार के अनुचित इस्तेमाल के खतरे एवं समाज में असमानता के निराकरण की लंबी प्रक्रिया

जनेयू का दूसरा टीच इन प्रो. आरी सितास द्वारा हुआ।ये दक्षिण अफ्रीका के हैं और समाज विज्ञान और राजनीति विज्ञानं के विद्वान अध्येता माने जाते हैं। 19 फरवरी के इनके विद्यार्थियों को दिये वक्तव्य का सार संक्षेप इस प्रकार है:

इनके अनुसार बर्लिन में बैठकर दक्षिण अफ्रीका को व्यापारिक उद्देश्यों के लिए तोड़ा गया था।उपनिवेशवाद ने वहाँ हीरे की खदानों के मिलने के बाद जोर पकड़ा।धीरे धीरे सोने के खदानों में खुदाई के लिये आये मजदूरों के साथ एक ऐसे नये राष्ट्रवाद की शुरुआत हुई जिसका हिस्सा अधिकतर लोग थे ही नहीं।

1886 में पास कानून लागू होने के साथ बिना पास के आरक्षित क्षेत्रों से बाहर निकलने वाले लोगों को जेलों में ठूँस दिया जाता। 1906 में लाए गये पोल टैक्स के तहत हर घर को नगद टैक्स देनें के लिये बाध्य किया गया। इसके लिये हर घर से लोगों को खदानों में काम करने के लिये विवश किया गया। 1906 में मजदूरों की सप्लाई का नियमन हुआ। 1913 में गोरों की जमीन का कानूनी तौर पर नियमन होने के बाद काले अपने लिये नियत क्षेत्र में ही रह सकते थे। 1923 में कालों से शहरी इलाकों में रहने का अधिकार छीना गया। 1924 में अफ्रीकी मूल के लोगों को गैर कामगार घोषित कर उनके संगठनों की मान्यता रद्द कर दी गयी।

 गाँधी की लड़ाई के कारण भारतीयों को एक अलग श्रेणी में शामिल कर दिया गया।
दक्षिण अफ्रीका में हुए इन अन्यायों के खिलाफ छात्रों ने मोर्चा खोला।अफ्रीकी मूल की कॉंग्रेस के स्थान पर सार्वभौम अफ्रीकी कॉंग्रेस जन्मी। वहीं से स्वाधीनता और समानता के लिये संघर्ष की शुरुआत हुई।
दूसरे विश्वयुद्ध में ये भरोसा दक्षिण अफ्रीका के लोगों को दिया गया की यदि वे युद्ध में संयुक्त राष्ट्र की सेनाओं की ओर से लड़े तो युद्ध जीतने के बाद उन्हें आजाद कर दिया जाएगा।
यहीं से अफ्रीकी राष्ट्रवाद ने जन्म लिया जो गोरों और कालों को अलग करता था। इसके बाद अफ्रीकन मूल्यों के सिद्धांत ने जन्म लिया। अफ्रीकन मूल्यों पर आधारित उपनिवेशवाद के विरोधी इस आंदोलन ने रंग भेद का विरोध किया।

आजादी न मिलने पर मंडेला ने भगतसिंह के दिखाये सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाया और 27 वर्ष के लिये जेल भेज दिये गये।धीरे-धीरे अगली पीढ़ियों ने मंडेला के स्थान को लिया।
काले लोगों की चेतना की पुनर्जागृति के लिये आंदोलन हुए। स्त्रियों के अधिकारों के आंदोलन चले। सरकार से असहयोग और अवज्ञा का आंदोलन हुआ।

 1980 तक जगह जगह नागरिक युद्ध हुए। सरकार विरोध को दबाने में विफल हुई। और सरकार विरोधी भी सरकार को हटा सकने में विफल रहे। 1989 में आपातकाल लगा दिया गया। लोगों को गिरफ्तार किया जाता और वे गायब हो जाते। आज तक ऐसे मामलों की जाँच आयोग कर रहा है।
1989 में मंडेला रिहा हुए परिस्थिति बदली।सरकार से समझौता हुआ। भूमि के अधिकार, मजदूरों के अधिकार, तथा पारंपरिक स्वशासन की बहाली हुई।
पुनर्निर्माण और उपनिवेशवाद के खात्मे के समझौते के साथ संविधान लागू हुआ।

संविधान ने अभिव्यक्ति की आजादी दी। पर आजादी में खतरा यही था कि अनाप सनाप बकने पर मेरा पड़ोसी मेरी पीठ तो तोड़ ही सकता था।
समानता और स्वतंत्रता का ये संघर्ष उपनिवेशवाद के खात्मे से आज तक जारी है।

 हम सुदूर से भारत के राष्ट्रीय प्रश्नों को देखने समझने की कोशिश करते हैं।हम गहराई से टैगोर,जामिनी रॉय,गाँधी, भगत सिंह को पढ़ते हैं। नेहरू अम्बेडकर के टकराव को समझने की कोशिश करते हैं। आर एस एस जिन्ना को जानने की कोशिश करते हैं।
आप हमसे सीख कर अपनी गलतियों को ठीक कर सकते हैं। हम आत्मगौरव तथा समाधान की तलाश में हैं। हम असंतुलन मुक्त बेहतर समाज चाहते हैं जिसमें सबके हितों की रक्षा हो सके।

ये मात्र संविधान से नहीं हो सकता। ये एक लंबी प्रक्रिया है। हम उन सब बंधनों को तोड़ रहे हैं जो हमारी स्वतंत्रता को कमजोर करते हैं। हम इससे उबरने के लिये एक दूसरे की मदद कर रहे हैं। हम एक जैसे नहीं हो सकते, होना भी नहीं चाहते।पर हम समानता चाहते हैं और समानता के मार्ग की हर बाधा को तोड़ना चाहते हैं।

जनेयू में अवतरित हुआ राष्ट्रवाद पर चर्चा का पर्व

गोपाल गुरु ने जनेयू में टीच इन का आरम्भ राष्ट्रवाद से किया । उनके प्रवचन का सार संक्षेप प्रस्तुत है। उनके अनुसार “यदि यथार्थ में देखा जाए तो भारत सामजिक रूप से अम्बेडकर की ‘पुरस्कृत’ और ‘बहिष्कृत’ की परिभाषा के अनुसार आज भी बँटा है। आजादी के 67 वर्ष बाद भी हम इस खाई को नहीं पाट पाए, ये दर्शाता है कि हममें इसकी नैतिक क्षमता है ही नहीं।”

“इस व्यव्स्था को बदलने के लिए हमारे पास प्रतीक चिन्ह के रूप में अशोक चक्र है। उसका घूमना इस बात का द्योतक है कि जो ऊपर है, उसे नीचे लाना ही होगा। नीचे वाले को ऊपर ले जाने का यही एक रास्ता है।विश्वविद्यालयों को राजनैतिक लोगों से यह पूछना होगा के क्या वो ये परिवर्तन कर सकेंगे।
लोगो के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हो क्या यही राष्ट्रवाद है? क्या लोगों के साथ दुर्व्यवहार राष्ट्रवाद है? सेनाएं और सीमाएं, बस राष्ट्रवाद यही हो जाएगा?
क्या बस भावना एकता का आधार होंगी। फिर तर्क संगत एकता का क्या होगा।
राष्ट्रवाद की जड़ बची रहे ये काम तो राज्य का है। इसे बचाने के लिए क़ानून और संविधान की प्रक्रिया की मदद राज्य को देनी होगी।राज्य ये कर भी सकेगा हमें ये विश्वास नहीं है।
राष्ट्र कमजोर पड़ रहा है, राज्य मजबूत हो रहा है। सत्ता पर बैठी पार्टी की राजनीति राष्ट्रवाद से बड़ी हो गयी है।
आज हममें से कितने हैं जिनका इस राष्ट्रवाद में कोई स्थान है? हममें से कितने हैं जो इस राष्ट्रवाद को अपना कह सकते हैं? इस राष्ट्रवाद में अपना सकने की नैतिक योग्यता अब बाकी रह गयी है? क्या हम अपने को राष्ट्र से जोड़ कर देखते हैं? जब राज्य को लगे कि लोग राष्ट्रवाद से भटक रहे हैं , तो उसे रोज जनमत संग्रह शुरू कर देना चाहिए।
यहाँ तो माजरा ही अलग है । राज्य तो लोगों पर झूठे आरोप गढ़ने में लग गया है। क्या सैन्यीकरण ही राष्ट्रहित है? लोग भूखे न मरें , आत्महत्या न करें , किसान आत्महत्या न करें – ये सच्चा राष्ट्रहित है?
राष्ट्र और राज्य के बीच का तनाव बढ़ रहा है। राज्य राष्ट्र से कहीं बहुत अधिक शक्तिशाली हो उठा है। राष्ट्रवाद को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता आ गयी है। ये पुरुष सत्तात्मक सोच हमारे लिए बड़े घाटे का सौदा साबित होगी।
हमें उस राष्ट्रवाद को वापस लाना होगा जो जन विरोधी न हो, अल्पसंख्यकों का विरोध न करता हो। और जो लोगों की आशाओं पर खरा उतरे।
हमें एक बात और याद रखनी होगी। सरकार राज्य नहीं होती, पर व्यस्था रूपी एक अंग मात्र होती है। और ये बाहरी खतरों की बात झूठी है। देश की संप्रभुता निओ लिबरल सत्ता ने समाप्त कर दी है। हमारी कोई स्वायत्तता बाकी नहीं बची है। अब हमारे लिए बाहर के लोग निर्णय ले रहे हैं। हमें क्या हो रहा है ये पता तक नहीं है।
ये व्यवस्था अब हमें रोज दीन हीन बनाने पर लगी है। ये राष्ट्र मुझे चोट पहुंचाता है, मुझ पर हमले करता है।ये वो राष्ट्रवाद है जो मुझे अपनाता नहीं है। मुझसे सहानुभूति भी नहीं रखता। ये हमारी आस्था का केंद्र हो ही नहीं सकता। ये हमसे सब कुछ जबरदस्ती करवाना चाहता है। ये राष्ट्रवाद और कुछ नहीं बस एक थोपी हुई भावना है।
ये क्रिकेट के खेल के दौरान पैदा हुई जोश की भावना का राष्ट्रवाद है।
न इस राष्ट्रवाद का हमारे जीवन में कोई योगदान रह गया है, न ये हमारे जीवन को गुणवत्ता दे रहा है। ये सोचिये कि जो लोग ‘स्वच्छ भारत’ की बात कर रहे है उन्हें गटर के गड्ढों में मरने वालों की कोई चिंता है भी?
सत्तारूढों और उद्योगपतियों को किसी के मरने पर रोना नहीं आता। उनकी चिंता के केंद्र बाजार हैं।
एक न एक दिन हमें इस राष्ट्रवाद को तोड़ना होगा। और उस की कंक्रीट के टुकड़े उड़ेंगे और फैलेंगे।”

तो गोपाल गुरु कहते हैं कि वे राष्ट्र तोड़ डालेंगे ।

बाबा साहब अम्बेडकर की दृष्टी में मनुवाद (भाग 5)

“हिन्दु धर्म के दर्शन पर विचार”

डा. अम्बेडकर ने हिन्दु धर्म पर सारा विचार वर्ण व्यवस्था को धर्म का केन्द्र बिन्दु मान कर रखा।

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उनके अनुसार एक हिन्दु दूसरे हिन्दू के साथ कुछ बाँट नहीं सकता । न जीवन काल में, न मृत्यू के बाद । एकता और भाईचारे की भावना से हिन्दु अपरिचित हैं। हिन्दुत्व वह सिद्घान्त है जो दो मनुष्यों की समानता को धार्मिक रूप से नकारता है।

हिन्दु के जीवन का हर क्षण धर्म से नियमित है। वो कैसे जिये, मरे तो कैसे जलाएँ। जब बच्चा पैदा हो तो कौन सा कर्म काण्ड़ किया जाय। उसका नामकरण, मुंडन, उसका पेशा, उसका विवाह, उसका खाना, क्या खाना, और क्या नहीं खाना, कितनी बार खाना, कितनी बार संध्या पूजा करना । दिन कैसे व्यतीत करना।

ये कुछ अजीब सी बात है कि कुछ शिक्षित हिन्दु ये मानते हैं कि इन सब बातों से कुछ अन्तर नहीं पडता।

परंतु वे ये भूल जाते हैं कि धर्म सामाज की सबसे बड़ी ताकत है। धर्म परमात्मा सत्ता  का अनुशासन है। उसकी व्यवस्था सामाज के आदर्शों को निर्धारित कर देती है। वो व्यवस्था दिखाई नहीं देते हुए भी हर रोज का जीता जागता सच है। जो धर्म को नकारते हैं, वो ये भूल कर बैठते हैं कि धर्मसत्ता कितनी प्रभावी और शक्तिशाली होती है। धर्म के आदर्श के रूप में स्थापित व्यवस्था के प्रभाव और शक्ति का मुकाबला मानवकृत कोई व्यवस्था कर ही नहीं सकती।

अछूत, अपमान और जनेयू

वर्ण व्यवस्था के घार्मिक आधार व हिन्दुओं में अछूतों के प्रति भ्रातृत्व के अभाव ने भयावह अपमान उत्पन्न किया। संवैधानिक और कानूनी प्रावघान भी परम्परागत रूप से सामाज में व्याप्त जाति के संस्कार को दूर नहीं कर पाए।

वामपंथी विचार इस अपमान का गहराई से अध्ययन करने लगे।

 2009 में अॉक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस ने “ह्यूमिलिएशन” शीर्षक से अपमान के सिद्धांत का अध्ययन प्रकाशित किया।

राष्ट्रवादी मान्यता ने स्त्री एवं अछूत माने जाने वाली जातियों के स्वाभिमान पर चोट कर रही मान्यताओं को अनदेखा किया। यह विश्वास इस अध्ययन के केन्द्र बिन्दू में था।

वैलेरियन रोड्रिक्स के अनुसार भारत से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह सांस्कृतिक रूप से गुलामी के समय की अपमानजनक व्यवस्था से अपने हर नागरिक को मुक्त करा सकेगा। रोड्रिक्स के अनुसार भारतीय संविधान की सबसे बड़ी चुनौती अछूतों को सार्वजनिक जीवन में हिस्सा देने की धी। रोड्रिक्स के अनुसार अछूत आज भी भारतीय समाज के हिस्से की तरह नहीं माने जाते।

भारतीय सामाज आज भी छूत अछूत, शुद्धि अशुद्धि के आदर्श से मुक्त नहीं हो पाया। ब्राह्मणवाद के पूर्वाग्रह ने अछूतों को अपमान से मुक्त नहीं होने दिया।
जनेयू के अध्यापकों तथा विद्यार्थियों का एक वर्ग राष्ट्रवाद को सामाजिक जीवन में हर दिन हो रहे अछूतों के अपमान की कसौटी में परख कर निरस्त करना चाहता है। 

बाबा साहब अम्बेडकर की दृष्टी में मनुवाद (भाग 4)

गाँधी और कांग्रेस नहीं देना चाहते अछूतों को राजनैतिक संरक्षण

बाबा साहब के अनुसार गाँधी अपनी अछूतों के मसीहां की इमेज को स्वराज के चैम्पियन की छवि से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। राउंड टेबल कांफ्रेंस के दौरान गांधी ने स्वयं को अछूतों का अग्रदूत बता डाला। अपने इस चैम्पियन के रोल को गांधी किसी के साथ साझा करने को तैयार नहीं। जब गांधी के इस दावे को ज़रा चुनौती  दी तो उन्होंने तमाशा बना डाला।

हाँ अपने अलावा वो काँग्रेस को भी अछूतों का चैम्पियन साबित करने पर तुल गए हैं।गांधी के अनुसार एक कांग्रेस ही तो है जिसने अछूतों के साथ हुई हर बुराई को ठीक कर देने की कसम खाई है। गांधी का तर्क ये है कि अछूतों के हितों को राजनैतिक रूप से रक्षा करने का प्रयास अनुचित और नुकसान दायक है। कांग्रेस की नीति और नियत पर बाबा साहब ने न  स्वतंत्रता से पहले भरोसा किया, न संविधान बनने के बाद। जब 1917 के अधिवेशन में कांग्रेस ने अछूतों पर लगी परंपरागत बंदिशों को ख़त्म करने की बात कही तो उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया।

उनके अनुसार एनी बेसेंट, जिन्होंने अधिवेशन की अध्यक्षता करी, वे तो खुले आम अछूतों के उत्पीड़न को समाज हित के लिए आवश्यक मानती रहीं, वो कब से अछूतों की हितैषी हो गयीं? साथ ही 1886 से कांग्रेस हर अधिवेशन में समाज सुधार के पचड़े में पड़ने से बचती रही। पर 1917 का प्रस्ताव मात्र राजनैतिक स्वार्थ से प्रेरित था, तथा जिसका एकमात्र उद्देश्य बेईमानी भरे रास्ते से अछूतों का समर्थन हासिल करना मात्र भर था।

बाबा साहब अम्बेडकर की दृष्टी में मनुवाद (भाग 3)

“…हम हिंदू हैं ,हम हिंदू ही रहेंगे…”

जनेयू के विद्यार्थियों ने अनेक तरह के विवादास्पद नारे 9 फरवरी 2016 को एक आतंकवाद और आतंकवादी को महिमामंडित करते हुए लगाए। पर जब उन पर पुलिस की कार्यवाही हुई और पूरे देश में उनकी थू थू हुई तो वे बाबा साहब के उपर्युक्त लेख की शरण में जा लेटे। उन्होंने मनुवाद और संघवाद से आजादी की बात करना शुरू किया।

वे ये भूल गये कि डा.अम्बेडकर ने संविधान सभा में 17दिसंबर 1946 में बोलते हुए कहा था “आज हमारा देश कई लड़ाकू दलों में बँट गया है।और मैं तो यहाँ तक मंजूर करूँगा कि ऐसे ही एक लड़ाकू दल के नेताओं में शायद मैं भी एक हूँ।परन्तु सभापति महोदय इन सब बातों के बावजूद भी मुझे इस बात का पक्का विश्वास है की समय और परिस्थिति अनुकूल होने पर दुनिया की कोई भी ताकत इस मुल्क को एक होने से रोक नहीं सकती।जाति और धर्म की भिन्नता के बावजूद भी हम किसी न किसी रूप में एक होंगे,इसमें मुझे जरा भी शक नहीं है।”

संविधान सभा में 21जनवरी 1947 को बोलते हुए श्री आर. वी.धुलेकर ने कहा कि”समाज के किसी अंग को अछूत बना देना और उनके मानवाधिकार छीन लेना कदापि क्षम्य नहीं है”।

इसमें संदेह नहीं कि अछूतों को घोर अपमान और कष्टों को झेलना पड़ा।लेकिन इस घृणास्पद और अमानवीय परम्परा के विरोध में देश में कोने कोने से आवाज उठी।

श्री एच.जे. खांडेकर ने 21जनवरी 1947 में संविधान सभा को याद दिलाया “हरिजनों के ऊपर आज तक अनंत अत्याचार और जुल्म हुए हैं और हो रहे हैं।मगर हमने बड़े धैर्य के साथ उन जुल्मों को सह लियाऔर यहाँ तक कि हमने कभी भी अपने धैर्य को छोड़ने की नहीं सोची।हम हिंदू हैं ,हम हिंदू ही रहेंगे और हिंन्दू रहते हुए ही अपने हक़ सम्पादन करेंगे,हम यह कभी नहीं कहेंगे कि हम हिन्दू नहीं हैं”।हम जरूर हिन्दू हैं और हिन्दू रहते हुए और हिंदुओं के साथ लड़कर अपने अधिकार प्राप्त करेंगे।”

हिन्दू होने के कारण हरिजनों पर मुसलामानों ने कैसे बर्बर अत्याचार किये ये याद दिलाते हुए उन्होंने कहा”हमें मालूम है नोआखाली के अंदर और ईस्ट बंगाल के अन्दर जो अत्याचार हुए हैं,उन अत्याचारों में 90 फी सदी हरिजनों पर जुल्म हुए। उनके मकान जलाए गए,उनके बाल बच्चे तबाह कर दिए गए,उनकी स्त्रियों पर, लड़कों पर अत्याचार किए गए। और इतना ही नहीं कई हजार हरिजनों को धर्मान्तर करना पड़ा”

बाबा साहब अम्बेडकर की दृष्टी में मनुवाद (भाग 2)

बम्बई प्रेसीडेंसी में तो सुनारों की ये हालत थी कि वे चुन्नट लगाकर धोती नहीं पहन सकते। वे एक दूसरे को “नमस्कार” नहीं कह सकते। मराठा शासन में ब्राम्हणों के अतिरिक्त अन्य कोई वेद मन्त्रों का उच्चारण नहीं कर सकता। करता तो उसकी जीभ काट दी जाती। अनेकों सुनारों की जीभ पेशवाओं ने इस कारण कटवा डाली कि उन्होंने वेद मंत्रों का उच्चारण करने का दुस्साहस किया।

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पूरे देशभर में ब्राम्हणों को मृत्युदंड हत्या करने पर भी नहीं दिया जा सकता था। पेशवाशाही में दंड जाति के आधार पर तय होता, न कि अपराध के आधार पर। कठोर श्रम और मृत्युदंड सिर्फ अछूतों को मिलता।

पेशवाशाही में ब्राम्हण पर न्यूनतम कर लगता। अछूत पर सबसे ज्यादा कर लगाया जाता। यही हाल बंगाल में भी था।

मनु जब कभी जन्मे हों, पर हर हिंदु शासन नें उन्हें ज़िंदा रखा। हिंदु सवर्ण या अछूत का न्याय मनु के कानून के आधार पर होता। ये क़ानून जतिगत विषमता पर आधारित था। इस क़ानून ने ब्राम्हणों को हर विशेषाधिकार दिया और शूद्र से हर मानवोचित अधिकार छीन लिया। ब्राम्हण जन्म से सर्वश्रेष्ठ होता और अछूत सबसे नीच। अछूत की किसी भी योग्यता का कोई मतलब था ही नहीं।

ब्राम्हणों का राज्य की हर व्यवस्था पर एकाधिकार था। देशभर की यही स्थिति थी। इसीलिये गैर ब्राम्हण पार्टियों ने न्यूनतम योग्यता के आधार पर जातिगत अनुपात में राज्य की सेवा में भाग का उचित सिद्धांत रक्खा।

राज्य को ठीक से चलाने के लिये हर जाति का अनुपातिक आधार पर प्रतिनिधत्व होना ही जरुरी है।

गैर ब्राम्हण पार्टियां मनुस्मृति को उलटा कर ब्राम्हणों को वहाँ खड़ा कर रही हैं जहाँ मनु ने शूद्रों को खड़ा किया। मनु ने जन्म के आधार पर ब्राम्हणों के विशेषाधिकार सुनिश्चित किये , शूद्रों को योग्य होने पर भी वंचित किया। अब बारी ब्राम्हणों की है।

ये असमानता हिंदुओं में ही नहीं, पूरी दुनिया में फ़ैली है।इसने समाजों को ऊँच, नीच, मुक्त और गुलामों में बाँट डाला है।

[बाबासाहब अम्बेडकर लेख एवं भाषण, बारहवां खंड, शिक्षा विभाग, महाराष्ट्र सरकार द्वारा 1993 में प्रकाशित, से, साभार।]