बाबा साहब अम्बेडकर की दृष्टी में मनुवाद (भाग 2)

By | April 1, 2016

बम्बई प्रेसीडेंसी में तो सुनारों की ये हालत थी कि वे चुन्नट लगाकर धोती नहीं पहन सकते। वे एक दूसरे को “नमस्कार” नहीं कह सकते। मराठा शासन में ब्राम्हणों के अतिरिक्त अन्य कोई वेद मन्त्रों का उच्चारण नहीं कर सकता। करता तो उसकी जीभ काट दी जाती। अनेकों सुनारों की जीभ पेशवाओं ने इस कारण कटवा डाली कि उन्होंने वेद मंत्रों का उच्चारण करने का दुस्साहस किया।

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पूरे देशभर में ब्राम्हणों को मृत्युदंड हत्या करने पर भी नहीं दिया जा सकता था। पेशवाशाही में दंड जाति के आधार पर तय होता, न कि अपराध के आधार पर। कठोर श्रम और मृत्युदंड सिर्फ अछूतों को मिलता।

पेशवाशाही में ब्राम्हण पर न्यूनतम कर लगता। अछूत पर सबसे ज्यादा कर लगाया जाता। यही हाल बंगाल में भी था।

मनु जब कभी जन्मे हों, पर हर हिंदु शासन नें उन्हें ज़िंदा रखा। हिंदु सवर्ण या अछूत का न्याय मनु के कानून के आधार पर होता। ये क़ानून जतिगत विषमता पर आधारित था। इस क़ानून ने ब्राम्हणों को हर विशेषाधिकार दिया और शूद्र से हर मानवोचित अधिकार छीन लिया। ब्राम्हण जन्म से सर्वश्रेष्ठ होता और अछूत सबसे नीच। अछूत की किसी भी योग्यता का कोई मतलब था ही नहीं।

ब्राम्हणों का राज्य की हर व्यवस्था पर एकाधिकार था। देशभर की यही स्थिति थी। इसीलिये गैर ब्राम्हण पार्टियों ने न्यूनतम योग्यता के आधार पर जातिगत अनुपात में राज्य की सेवा में भाग का उचित सिद्धांत रक्खा।

राज्य को ठीक से चलाने के लिये हर जाति का अनुपातिक आधार पर प्रतिनिधत्व होना ही जरुरी है।

गैर ब्राम्हण पार्टियां मनुस्मृति को उलटा कर ब्राम्हणों को वहाँ खड़ा कर रही हैं जहाँ मनु ने शूद्रों को खड़ा किया। मनु ने जन्म के आधार पर ब्राम्हणों के विशेषाधिकार सुनिश्चित किये , शूद्रों को योग्य होने पर भी वंचित किया। अब बारी ब्राम्हणों की है।

ये असमानता हिंदुओं में ही नहीं, पूरी दुनिया में फ़ैली है।इसने समाजों को ऊँच, नीच, मुक्त और गुलामों में बाँट डाला है।

[बाबासाहब अम्बेडकर लेख एवं भाषण, बारहवां खंड, शिक्षा विभाग, महाराष्ट्र सरकार द्वारा 1993 में प्रकाशित, से, साभार।]