बाबा साहब अम्बेडकर की दृष्टी में मनुवाद (भाग 4)

By | April 2, 2016

गाँधी और कांग्रेस नहीं देना चाहते अछूतों को राजनैतिक संरक्षण

बाबा साहब के अनुसार गाँधी अपनी अछूतों के मसीहां की इमेज को स्वराज के चैम्पियन की छवि से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। राउंड टेबल कांफ्रेंस के दौरान गांधी ने स्वयं को अछूतों का अग्रदूत बता डाला। अपने इस चैम्पियन के रोल को गांधी किसी के साथ साझा करने को तैयार नहीं। जब गांधी के इस दावे को ज़रा चुनौती  दी तो उन्होंने तमाशा बना डाला।

हाँ अपने अलावा वो काँग्रेस को भी अछूतों का चैम्पियन साबित करने पर तुल गए हैं।गांधी के अनुसार एक कांग्रेस ही तो है जिसने अछूतों के साथ हुई हर बुराई को ठीक कर देने की कसम खाई है। गांधी का तर्क ये है कि अछूतों के हितों को राजनैतिक रूप से रक्षा करने का प्रयास अनुचित और नुकसान दायक है। कांग्रेस की नीति और नियत पर बाबा साहब ने न  स्वतंत्रता से पहले भरोसा किया, न संविधान बनने के बाद। जब 1917 के अधिवेशन में कांग्रेस ने अछूतों पर लगी परंपरागत बंदिशों को ख़त्म करने की बात कही तो उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया।

उनके अनुसार एनी बेसेंट, जिन्होंने अधिवेशन की अध्यक्षता करी, वे तो खुले आम अछूतों के उत्पीड़न को समाज हित के लिए आवश्यक मानती रहीं, वो कब से अछूतों की हितैषी हो गयीं? साथ ही 1886 से कांग्रेस हर अधिवेशन में समाज सुधार के पचड़े में पड़ने से बचती रही। पर 1917 का प्रस्ताव मात्र राजनैतिक स्वार्थ से प्रेरित था, तथा जिसका एकमात्र उद्देश्य बेईमानी भरे रास्ते से अछूतों का समर्थन हासिल करना मात्र भर था।