अभिव्यक्ति के अधिकार के अनुचित इस्तेमाल के खतरे एवं समाज में असमानता के निराकरण की लंबी प्रक्रिया

By | April 9, 2016

जनेयू का दूसरा टीच इन प्रो. आरी सितास द्वारा हुआ।ये दक्षिण अफ्रीका के हैं और समाज विज्ञान और राजनीति विज्ञानं के विद्वान अध्येता माने जाते हैं। 19 फरवरी के इनके विद्यार्थियों को दिये वक्तव्य का सार संक्षेप इस प्रकार है:

इनके अनुसार बर्लिन में बैठकर दक्षिण अफ्रीका को व्यापारिक उद्देश्यों के लिए तोड़ा गया था।उपनिवेशवाद ने वहाँ हीरे की खदानों के मिलने के बाद जोर पकड़ा।धीरे धीरे सोने के खदानों में खुदाई के लिये आये मजदूरों के साथ एक ऐसे नये राष्ट्रवाद की शुरुआत हुई जिसका हिस्सा अधिकतर लोग थे ही नहीं।

1886 में पास कानून लागू होने के साथ बिना पास के आरक्षित क्षेत्रों से बाहर निकलने वाले लोगों को जेलों में ठूँस दिया जाता। 1906 में लाए गये पोल टैक्स के तहत हर घर को नगद टैक्स देनें के लिये बाध्य किया गया। इसके लिये हर घर से लोगों को खदानों में काम करने के लिये विवश किया गया। 1906 में मजदूरों की सप्लाई का नियमन हुआ। 1913 में गोरों की जमीन का कानूनी तौर पर नियमन होने के बाद काले अपने लिये नियत क्षेत्र में ही रह सकते थे। 1923 में कालों से शहरी इलाकों में रहने का अधिकार छीना गया। 1924 में अफ्रीकी मूल के लोगों को गैर कामगार घोषित कर उनके संगठनों की मान्यता रद्द कर दी गयी।

 गाँधी की लड़ाई के कारण भारतीयों को एक अलग श्रेणी में शामिल कर दिया गया।
दक्षिण अफ्रीका में हुए इन अन्यायों के खिलाफ छात्रों ने मोर्चा खोला।अफ्रीकी मूल की कॉंग्रेस के स्थान पर सार्वभौम अफ्रीकी कॉंग्रेस जन्मी। वहीं से स्वाधीनता और समानता के लिये संघर्ष की शुरुआत हुई।
दूसरे विश्वयुद्ध में ये भरोसा दक्षिण अफ्रीका के लोगों को दिया गया की यदि वे युद्ध में संयुक्त राष्ट्र की सेनाओं की ओर से लड़े तो युद्ध जीतने के बाद उन्हें आजाद कर दिया जाएगा।
यहीं से अफ्रीकी राष्ट्रवाद ने जन्म लिया जो गोरों और कालों को अलग करता था। इसके बाद अफ्रीकन मूल्यों के सिद्धांत ने जन्म लिया। अफ्रीकन मूल्यों पर आधारित उपनिवेशवाद के विरोधी इस आंदोलन ने रंग भेद का विरोध किया।

आजादी न मिलने पर मंडेला ने भगतसिंह के दिखाये सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाया और 27 वर्ष के लिये जेल भेज दिये गये।धीरे-धीरे अगली पीढ़ियों ने मंडेला के स्थान को लिया।
काले लोगों की चेतना की पुनर्जागृति के लिये आंदोलन हुए। स्त्रियों के अधिकारों के आंदोलन चले। सरकार से असहयोग और अवज्ञा का आंदोलन हुआ।

 1980 तक जगह जगह नागरिक युद्ध हुए। सरकार विरोध को दबाने में विफल हुई। और सरकार विरोधी भी सरकार को हटा सकने में विफल रहे। 1989 में आपातकाल लगा दिया गया। लोगों को गिरफ्तार किया जाता और वे गायब हो जाते। आज तक ऐसे मामलों की जाँच आयोग कर रहा है।
1989 में मंडेला रिहा हुए परिस्थिति बदली।सरकार से समझौता हुआ। भूमि के अधिकार, मजदूरों के अधिकार, तथा पारंपरिक स्वशासन की बहाली हुई।
पुनर्निर्माण और उपनिवेशवाद के खात्मे के समझौते के साथ संविधान लागू हुआ।

संविधान ने अभिव्यक्ति की आजादी दी। पर आजादी में खतरा यही था कि अनाप सनाप बकने पर मेरा पड़ोसी मेरी पीठ तो तोड़ ही सकता था।
समानता और स्वतंत्रता का ये संघर्ष उपनिवेशवाद के खात्मे से आज तक जारी है।

 हम सुदूर से भारत के राष्ट्रीय प्रश्नों को देखने समझने की कोशिश करते हैं।हम गहराई से टैगोर,जामिनी रॉय,गाँधी, भगत सिंह को पढ़ते हैं। नेहरू अम्बेडकर के टकराव को समझने की कोशिश करते हैं। आर एस एस जिन्ना को जानने की कोशिश करते हैं।
आप हमसे सीख कर अपनी गलतियों को ठीक कर सकते हैं। हम आत्मगौरव तथा समाधान की तलाश में हैं। हम असंतुलन मुक्त बेहतर समाज चाहते हैं जिसमें सबके हितों की रक्षा हो सके।

ये मात्र संविधान से नहीं हो सकता। ये एक लंबी प्रक्रिया है। हम उन सब बंधनों को तोड़ रहे हैं जो हमारी स्वतंत्रता को कमजोर करते हैं। हम इससे उबरने के लिये एक दूसरे की मदद कर रहे हैं। हम एक जैसे नहीं हो सकते, होना भी नहीं चाहते।पर हम समानता चाहते हैं और समानता के मार्ग की हर बाधा को तोड़ना चाहते हैं।