जनेयू में अवतरित हुआ राष्ट्रवाद पर चर्चा का पर्व

By | April 3, 2016

गोपाल गुरु ने जनेयू में टीच इन का आरम्भ राष्ट्रवाद से किया । उनके प्रवचन का सार संक्षेप प्रस्तुत है। उनके अनुसार “यदि यथार्थ में देखा जाए तो भारत सामजिक रूप से अम्बेडकर की ‘पुरस्कृत’ और ‘बहिष्कृत’ की परिभाषा के अनुसार आज भी बँटा है। आजादी के 67 वर्ष बाद भी हम इस खाई को नहीं पाट पाए, ये दर्शाता है कि हममें इसकी नैतिक क्षमता है ही नहीं।”

“इस व्यव्स्था को बदलने के लिए हमारे पास प्रतीक चिन्ह के रूप में अशोक चक्र है। उसका घूमना इस बात का द्योतक है कि जो ऊपर है, उसे नीचे लाना ही होगा। नीचे वाले को ऊपर ले जाने का यही एक रास्ता है।विश्वविद्यालयों को राजनैतिक लोगों से यह पूछना होगा के क्या वो ये परिवर्तन कर सकेंगे।
लोगो के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हो क्या यही राष्ट्रवाद है? क्या लोगों के साथ दुर्व्यवहार राष्ट्रवाद है? सेनाएं और सीमाएं, बस राष्ट्रवाद यही हो जाएगा?
क्या बस भावना एकता का आधार होंगी। फिर तर्क संगत एकता का क्या होगा।
राष्ट्रवाद की जड़ बची रहे ये काम तो राज्य का है। इसे बचाने के लिए क़ानून और संविधान की प्रक्रिया की मदद राज्य को देनी होगी।राज्य ये कर भी सकेगा हमें ये विश्वास नहीं है।
राष्ट्र कमजोर पड़ रहा है, राज्य मजबूत हो रहा है। सत्ता पर बैठी पार्टी की राजनीति राष्ट्रवाद से बड़ी हो गयी है।
आज हममें से कितने हैं जिनका इस राष्ट्रवाद में कोई स्थान है? हममें से कितने हैं जो इस राष्ट्रवाद को अपना कह सकते हैं? इस राष्ट्रवाद में अपना सकने की नैतिक योग्यता अब बाकी रह गयी है? क्या हम अपने को राष्ट्र से जोड़ कर देखते हैं? जब राज्य को लगे कि लोग राष्ट्रवाद से भटक रहे हैं , तो उसे रोज जनमत संग्रह शुरू कर देना चाहिए।
यहाँ तो माजरा ही अलग है । राज्य तो लोगों पर झूठे आरोप गढ़ने में लग गया है। क्या सैन्यीकरण ही राष्ट्रहित है? लोग भूखे न मरें , आत्महत्या न करें , किसान आत्महत्या न करें – ये सच्चा राष्ट्रहित है?
राष्ट्र और राज्य के बीच का तनाव बढ़ रहा है। राज्य राष्ट्र से कहीं बहुत अधिक शक्तिशाली हो उठा है। राष्ट्रवाद को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता आ गयी है। ये पुरुष सत्तात्मक सोच हमारे लिए बड़े घाटे का सौदा साबित होगी।
हमें उस राष्ट्रवाद को वापस लाना होगा जो जन विरोधी न हो, अल्पसंख्यकों का विरोध न करता हो। और जो लोगों की आशाओं पर खरा उतरे।
हमें एक बात और याद रखनी होगी। सरकार राज्य नहीं होती, पर व्यस्था रूपी एक अंग मात्र होती है। और ये बाहरी खतरों की बात झूठी है। देश की संप्रभुता निओ लिबरल सत्ता ने समाप्त कर दी है। हमारी कोई स्वायत्तता बाकी नहीं बची है। अब हमारे लिए बाहर के लोग निर्णय ले रहे हैं। हमें क्या हो रहा है ये पता तक नहीं है।
ये व्यवस्था अब हमें रोज दीन हीन बनाने पर लगी है। ये राष्ट्र मुझे चोट पहुंचाता है, मुझ पर हमले करता है।ये वो राष्ट्रवाद है जो मुझे अपनाता नहीं है। मुझसे सहानुभूति भी नहीं रखता। ये हमारी आस्था का केंद्र हो ही नहीं सकता। ये हमसे सब कुछ जबरदस्ती करवाना चाहता है। ये राष्ट्रवाद और कुछ नहीं बस एक थोपी हुई भावना है।
ये क्रिकेट के खेल के दौरान पैदा हुई जोश की भावना का राष्ट्रवाद है।
न इस राष्ट्रवाद का हमारे जीवन में कोई योगदान रह गया है, न ये हमारे जीवन को गुणवत्ता दे रहा है। ये सोचिये कि जो लोग ‘स्वच्छ भारत’ की बात कर रहे है उन्हें गटर के गड्ढों में मरने वालों की कोई चिंता है भी?
सत्तारूढों और उद्योगपतियों को किसी के मरने पर रोना नहीं आता। उनकी चिंता के केंद्र बाजार हैं।
एक न एक दिन हमें इस राष्ट्रवाद को तोड़ना होगा। और उस की कंक्रीट के टुकड़े उड़ेंगे और फैलेंगे।”

तो गोपाल गुरु कहते हैं कि वे राष्ट्र तोड़ डालेंगे ।