गुहा, संघ और अम्बेडकर

By | April 22, 2016
रामचन्द्र गुहा जी ने गुरु जी गोलवलकर के लेख का स्मरण संघ को दिलाया है। गुरु जी ने कहा था कि महर्षि नेहरू और ऋषि अम्बेडकर ने संविधान के नाम पर सनातन धर्म को तिलांजलि दे डाली। ऐसे में आज अम्बेडकर को हिंदु सुधार और एकता का प्रतीक बताना संघ के अन्तर्विभेद का द्योतक है।
Guha RSS & Ambedkar| Shridev Sharma | JNURow
 
गुहा जी परम विद्वान विचारक हैं। इस में कहाँ संदेह है कि सनातन धर्म में पति और पत्नी दो कहाँ रह जाते थे। सनातन धर्म में भगवान वेद अपने मन्त्रों से अग्नि की साक्षी में दोनों को कभी अलग न हों इस तरह एक कर देते थे। दोनों का शरीर मन वचन एक हो जाय यह ही तो गृहस्थ धर्म की सिद्धि थी। तो ऐसे में तलाक उन दिनों कौन सोचता। गुरु जी तो हर स्वयंसेवक के परिवार के अभिभावक थे हिंदुओं को जोड़ने के काम में जुटे थे। उनका तलाक के प्रावधानों पर यह प्रक्रिया देना स्वाभाविक ही था।

The Indian Express | April 21, 2016 8:11 am | by Ramachandra Guha 

http://indianexpress.com/article/opinion/columns/br-ambedkar-2762688/

रही बात ऋषी महर्षी की तो 1935 के गोवरन्मेंट ऑफ इण्डिया एक्ट को संविधान बनाने की दृष्टि पंडित नेहरू की थी। संविधान सभा ने बहस तो बहुत करी पर संवैधानिक प्रावधानों के रूप में तो अंग्रेज के गोवरन्मेंट ऑफ़ इण्डिया एक्ट को ही स्थान दे दिया गया।नेहरू जी पुरी तरह उस व्यवस्था को बहाल रखने में लगे थे। उनकी आस्था मात्र उसी व्यस्था में थी।

ये तो बाबा साहब का माद्दा था कि वे कुछ क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाले प्रावधान नेहरू के विरोध करने पर भी संविधान सभा में पारित करवा सके।
तो नेहरू वो महर्षि बने जिन्हें वेस्टमिनिस्टर मॉडल का अक्षरशः अनुकरण करने वाली नई भारतीय संप्रभु सत्ता की राजविद्या का प्रथम साक्षात्कार मिला। प्रधानमंत्री होने के कारण अम्बेडकर को उन्होंने ऋषि ही रहने दिया यानि ज्यादा चलने न दी नहीं तो अम्बेडकर तो धर्मवादी व्यवस्था लाते। तो गुरु जी तो अक्षरशः ठीक थे।

आज अब जो बचा खुचा भारत रह गया है, उसमें बुद्धि जीवियों का आचरण अत्यंत संदेहास्पद है। वो भारत में जातियुद्ध कराने वाले विचार के भाषण करते हुए उच्चे उच्चे नारे लगा रहे हैं। वो भारत को खंड खंड करना चाहते हैं।वो ऐसा वातावरण तैयार कर रहे हैं कि लोग भारत में पैसा न ला सकें। भारतीय व्यापारी सदा से राष्ट्रवाद का पोषक रहा है। उस व्यापारी को कलुषित कर बदनाम करने में प्रगतिशील लेखकों को अपार आनंद मिलता रहा है। अब वो उसे जातियुद्ध में झोंक कर बर्बाद कर देना चाहते हैं। ताकि राष्ट्रवाद को झकझोर झकझोर कर हिला सकें।

The Indian Express | December 10, 2015 3:30pm | by Ramachandra Guha 

http://indianexpress.com/article/opinion/columns/bhagwats-ambedkar/

जहाँ राष्ट्र की सीमा का गौरवशाली प्रहरी वीर जवान है, वहीं समाज में व्यापारी हर नुक्कड़, गली मोहल्ले में बैठ कर अर्थव्यवस्था की गति के सारथी का काम करता है। टैक्स देता है, सामाजिक धार्मिक कार्यों में सहयोग करता है। उसे ध्वस्त करने का तरीका है जाति के आधार पर झगड़े कराना।
गुजरात हरियाणा के जाति आन्दोलनों को हम देख ही चुके हैं।
तो ऐसे में संघ अपने राष्ट्रधर्म का पालन कर रहा है। डॉ हेगडेवार ने संघ की स्थापना सनातन देशधर्म का पालन करने के लिए ही तो की थी। हर स्वयंसेवक भारतमाता का सच्चा वीरव्रती उपासक है।

गुहा महाशय को ये निस्संदेह मान लेना चाहिये कि यदि गुरु जी आज होते तो वो भी ये ही करते। साथ ही में पूरे देश की एक परिक्रमा कर घर घर में ये सन्देश दे देते। संघ भी यही करेगा सीधे सच्चे शब्दों में जनेयू के आचार्यों के उद्देश्य घर घर में बताएगा। भारत में भगवान वामपंथी भी मानते हैं, कई तो कट्टर सनातनधर्मी विचारों से भी यदाकदा प्रेरित हो उठते हैं। उन्हें अच्छे से ये पता है कि इस धरती को भगवान मानने वाले संघी ही नहीं सभी देश वासी हैं।ये भावना से जुड़ा मुद्दा है।

ये तो दुर्बुद्धि ही होंगे जो लोगों की भावना को आहत करने वाले भाषण छाती ठोक ठोक कर दे रहे हैं। वो भी देश तोड़ने का सन्देश देने के लिये ताकि इराक और सीरिया जैसी दुर्गति भारत और हिंदुओं की हो जाए। हिन्दू देश धर्म संस्कृति सम्मान और सम्पदा सब खो बैठें।

इस मुद्दे पर संघ को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश गुहा जी क्यों कर रहे हैं ये तो स्पष्ट हो ही गया है। 
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