ऊं

By | May 30, 2016
स्वभावतः हम सभी जन्म से ही एक पहचान प्राप्त कर लेते हैं। ये पहचान हमें मैं और मेरा इस तरह की अनेकों सीमाओं में बाँध देती है। इस सीमित स्व से अपने परम विस्तार को ज्ञात करानॆ वाली विद्या ही ब्रम्ह विद्या है। यह विद्या उपनिषद, गीता, ब्रम्हसूत्र इस प्रस्थान त्रयी में उपनिबद्ध है।
Om, Shridev Sharma, ऊं
ये ब्रम्ह विद्या आत्मा के उस यथार्थ, शाश्वत तथा नित्य स्वरूप का साक्षात्कार कराती है जो सर्वत्र विद्यमान है। ऐसा आत्मा कर्ममार्ग के लिये आवश्यक धर्मों से भिन्न तथा सदा निष्पाप है। यह दृष्टि तो लोक, वित्त, तथा पुत्र इन एषणाओं को छोड़ने से ही मिलती है। सामाजिक प्रतिष्ठा,तरह तरह के धन, तथा पुत्रों शिष्यों की प्राप्ति की कामना, स्व की सर्वत्र व्याप्त सत्ता का साक्षात्कार नहीं होने देती।
पर जब तक ये देहात्म बुद्धि नहीं छूटे तब तक शास्त्रोक्त नित्य नैमित्तिक कर्मों का अनुष्ठान करना, एषणाओं की सिद्धि हेतु देवताओं की उपासना करना। इस प्रकार अपने सारे जीवन का निर्वाह करना यही ईशावास्योपनिषद् का उपदेश है।
इसी प्रसंग में अविद्या और विद्या का विचार उपनिषद् ने किया। अविद्या वेदोक्त कर्मों काअनुष्ठान है। विद्या स्व में देवत्व प्राप्ति हेतु उपासना है। इन दोनों का साथ ही अनुष्ठान करना उचित है। अन्यथा कर्मपरक अविद्या अकेले अनुष्ठान करने से आत्मदर्शन से विपरीत अंधकार की ओर ले जाने वाली होगी। कर्म मार्ग का अनुष्ठान न कर यदि मात्र देवत्व जागृति के लिये विद्या रुपी उपासना ही करेगा तो लोक की व्यवस्था का उच्छेद और गहरे अँधेरे में ले जायेगा।
इस प्रकार विद्या और अविद्या के फल देवलोक एवं पितृलोक के देनेवाल होने से भिन्न हैं। पर यदि विद्या एवं अविद्या का अनुष्ठान यदि सम्मिलित रूप से किया जाय तो कर्म मृत्यु से पार कर देगा और विद्या देवत्व को जागृत कर अमृतत्त्व को प्राप्त करा देगी।
इस देवत्व को जागृत कराने वाली विद्या का स्वरूप दो प्रकार का है। एक असम्भूति अर्थात कारण ब्रम्ह की उपासना दूसरा सम्भूति अर्थात कार्य ब्रम्ह की उपासना। सभी कार्यों का संभवन(उत्पत्ति) स्थान कारण ब्रम्ह है। अकेले, असम्भूति जो सकल काम और कर्मों के बीज रूप में होने के कारण अव्यक्त और अदर्शनीय है, की उपासना से साक्षात्कार भी अंधकार रूप ही होगा। इसी प्रकार कार्यब्रम्ह की अकेले उपासना का फल भी अंधकार रूप ही है।
कार्य ब्रम्ह (संभूति) की उपासना अणिमादि ऐश्वर्यों को देगी वहीं कारण ब्रम्ह की उपासना प्रकृतिलय करा देगी। इस प्रकार दोनों का फल धैर्य पूर्वक अनुभव कर चुके लोगों से सुना गया है।
इस प्रकार, अनैश्वर्य, अधर्म, अवैराग्य की निवृत्ति हिरण्यगर्भ रूप कार्य ब्रम्ह की उपासना से होने के बाद अणिमादि ऐश्वर्यों को प्राप्त कर, पुनः कारण ब्रम्ह में अमृतरूप प्रकृति लय को एक साथ में उपासना करने से प्राप्त करता है।