धर्म एवं संविधान

By | January 5, 2017

हमारे राष्ट्र भारत ने राजा राम से लेकर वर्तमान संविधान तक की यात्रा तय करी। संस्कृत के आदि कवि वाल्मीकि ने रामायण की रचना करी । कवि का अर्थ संस्कृत में, कविता लिखने वाले तक सीमित नहीं है अपितु कवि तो क्रांतदर्शी है।  क्रांतदर्शी वो है जिसकी दृष्टि को समय अपनी सीमाओं मे न बाँध सके ।  जो भूत भविष्य वर्तमान को एक साथ अनुभव कर सके वही सच्चा कवि है।  उस कवि दृष्टि ने राम को जाना जो प्रजाओं के हितैषी हैं ।  जिनका वचन पक्का है।  जिनके जीवन का उद्देश्य प्रजाओं की भलाई के अलावा और कुछ नहीं है।

धर्म एवम् संविधान

ऐसा तभी सम्भव हुआ क्योंकि राम धर्मज्ञ थे ।  धर्म तो हमारी अपने अंदर की समझ है।  धर्म सतत अपने आत्मविकास का मार्ग है।  वह हमे दूसरे के साथ बाँटने की प्रवृत्ति देता है। सच्चाई का पाठ सिखाता है।  दूसरे को क्षमा करने की दृष्टि देता है। दूसरे को नुक़सान न पहुँचाने की  बुद्धि ही सच्ची अहिंसा है और इसे जीवन में उतारने की प्रेरणा और शिक्षा धर्म से ही प्राप्त होती है।  राम ऐसे ही सकल गुणों के सागर होने के कारण लोकप्रिय राज्य व्यवस्था के मूर्तिमान रूप बने ।

हमारी वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था भी, न्याय, स्वतंत्रता, समता, और बंधुत्व की स्थापना के लिये है। पर क्या ये क़ानून बनाने और लागू करने से हो सकेगा? ये तो तभी सम्भव होगा जब हर नागरिक इसे अपने जीवन मे आत्मसात करे और अपनी विवेक बुद्धि मे उतार ले । सद्गुणों को आत्मसात कर दैनन्दिन व्यवहार मे उतार लेने की व्यवस्था ही धर्म है। ये व्यवस्था जिस समाज मे शतप्रतिशत सफल हो जाये वहाँ ही रामराज्य  है।