क्या अम्बेडकर मनुवादी थे ?

By | April 25, 2016

इंडियन एक्सप्रेस में प्रो. शमसुल इस्लाम ने 23 अप्रैल को  एक ” नहीं है अम्बेडकर से प्रेम” इस शीर्षक से लेख निकाला। गुरू जी के हिंदु जनों के विराट पुरुषत्व की अवधारणा के आधार पर मनुस्मृति के संवैधानिक सिद्धांतों की अवहेलना संविधान सभा द्वारा किये जाने को याद दिलाया। साथ ही यह भी कह डाला कि ये तो दलितों को सवर्णों के सेवक बने रहने के मनु के सिद्धांत से गुरु जी की गहनता का परिचायक है।

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अब ऊपर लिखे बिंदुओं पर विचार करें तो यह किसी राजनीति शास्त्र के गहन अध्येता की बारीक समझ से निकला हुआ तो बिलकुल नहीं लगता।
अकादमिक दृष्टिकोण तो वह तब हो सकता है कि जब वो निष्पक्ष हो।निष्पक्षता से विचार करें तो संघ और संघ का सिद्धांत क्या है? संघ का एकमात्र सिद्धांत भारत माता की नैष्ठिक और स्वतः प्रेरित सेवा करना। जो इसे जीवन सिद्धांत अपनी स्वतः प्रेरणा से मान ले वह ही स्वयंसेवक है।

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तो इस दृष्टि से देखा जाय तो अम्बेडकर ने निस्संदेह रूप से भारत माता की सेवा करी। उन्होंने हिंदु समाज को दुर्बल करने वाले छुआछूत के बखेड़े को छोड़ने के लिये समझाया। छुआछूत का शिकार राजसत्ता से गिरे क्षत्रियों को बनाया गया ये तो उनका सिद्धांत था। तो इस दलन का शिकार बने दलित वास्तव में क्षत्रिय हैं ये सच जगजाहिर करने वालेअम्बेडकर मनुवादी मान लिये जाएँगे।
जो भी हो हिंदु हित चिंतक और भारत माता के सच्चे सपूत होने के नाते अम्बेडकर संघ के लिये सम्माननीय थे और रहेंगे। संघ तो छुआछूत जातपात गरीब अमीर शिक्षित अशिक्षित का भेद हिंदु मात्र के मन से से मिटाने की सच्ची व्यवस्था का नाम है। भेद भाव मिटाना,मन मिलाना,सब को सहेज के चलना,यही तो संघ व्यस्था का मूलमंत्र है।एक प्रचारक का जीवन इसी साधना में जाता है।
संघ समाज को विषमुक्त करने की संस्था है। इसी लिये भव्यता से खड़ी है और लोकमान्य है।